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Meera Bai

मीरा बाई की जीवनी

दूनिया भर में भगवान को मानने वाले लाखों-करोड़ो भक्त हैं पर कुछ ही ऐसे हो पाते है जो अपना सर्वश्य अपने आराध्य की सेवा में लगा देते है। श्रीकृष्ण की एक ऐसी भक्त भी हुई थी जो अपने पुरे जीवन को कृष्ण के प्रेम में समर्पित कर दिया और अंत में कृष्ण में ही विलीन हो गयी। बच्चपन से ही उन्होंने कान्हा को अपना पति मान लिया और सभी मोह माया को त्याग दिया। यहा हम आज मीरा बाई के जीवन से जुडी मुख्य बातो को बताने वाले है।मीरा बाई की जीवनी 
 
मीरा बाई एक मध्यकालीन हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और कृष्ण भक्त थीं। भक्ति आन्दोलन में उनका मुख्य स्थान है।  भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित उनके भजन आज भी उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय हैं और श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं।
 

मीराबाई का प्रारंभिक जीवन

 
मीराबाई के जीवन को लेकर  विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं हैं।  अलग अलग विद्वानों ने मीरा बाई की जीवनी पर प्रकाश डालने की कोशिश की है ।
 
राजस्थान के मेड़ता में 1498 ईस्वी को मीराबाई का जन्म हुआ था। उनके पिता मेड़ता के राजा थे। कहते हैं कि जब मीराबाई बहुत छोटी थी तो उनकी मां ने श्रीकृष्ण को यूं ही उनका दूल्हा बता दिया।
 
उनके पिता रतन सिंह राठोड़ एक छोटे से राजपूत रियासत के शासक थे। वे अपनी माता-पिता की इकलौती संतान थीं और जब वे छोटी बच्ची थीं तभी उनकी माता का निधन हो गया था। उन्हें संगीत, धर्म, राजनीति और प्राशासन जैसे विषयों की शिक्षा दी गयी। मीरा का लालन-पालन उनके दादा के देख-रेख में हुआ जो भगवान् विष्णु के गंभीर उपासक थे और एक योद्धा होने के साथ-साथ भक्त-हृदय भी थे और साधु-संतों का आना-जाना इनके यहाँ लगा ही रहता था। इस प्रकार मीरा बचपन से ही साधु-संतों और धार्मिक लोगों के सम्पर्क में आती रहीं।
 

मीराबाई का विवाह

 
मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ सन 1516 में  हुआ। पर उन्हें अपने पति से नही कृष्ण से प्रेम था। विवाह के पांच साल बाद एक युद्ध में उनके पति की मृत्यु हो गयी। उस समय पति की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को सती होना पड़ता था पर मीरा बाई इसके लिए तैयार नही हुई।उन्होंने इसका विरोध किया और अपने पति को कृष्ण के रूप में जीवित बताया। संसार को वो रास नही आ रही थी ,इसलिए  संसार परिवार को छोड़ साधू संतो के साथ कीर्तन में समय बिताने लगी। उनकी हर सांस पर कृष्ण कृष्ण का जप था। उन्होंने भक्तिकाल में बहुत ही प्यारे भजन और कविताये कृष्ण प्रेम में लिखी।
 

मीरा बाई की कृष्ण भक्ति

 
पति के मृत्यु के बाद इनकी भक्ति दिनों-दिन बढ़ती गई। मीरा अक्सर मंदिरों में जाकर कृष्णभक्तों के सामने कृष्ण की मूर्ति के सामने नाचती रहती थीं। मीराबाई की कृष्णभक्ति और इस प्रकार से नाचना और गाना उनके पति के परिवार को अच्छा नहीं लगा जिसके वजह से कई बार उन्हें विष देकर मारने की कोशिश की गई। पर उन सभी कोशिशो पर कृष्ण की भक्त की ही विजय हुई।
 
मीरा बाई ब्रज की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ीं। सन्‌ 1539 में मीरा बाई वृंदावन में रूप गोस्वामी से मिलीं। वृंदावन में कुछ साल निवास करने के बाद मीराबाई सन्‌ 1546 के आस-पास द्वारका धाम  चली गईं।
 
तत्कालीन समाज में मीराबाई को एक विद्रोही माना गया क्योंकि उनके धार्मिक क्रिया-कलाप किसी राजकुमारी और विधवा के लिए स्थापित परंपरागत नियमों के अनुकूल नहीं थे। वे तो कृष्ण के रूप में परे पति को प्रेम करती थी। साधू संतो के साथ बैठना और तीर्थ यात्रा करना समाज को अखरता था।
 

मीरा बाई की मृत्यु

ऐसा माना जाता है कि बहुत दिनों तक राधे कृष्ण की प्रेम नगरी वृन्दावन में रहने के बाद मीरा द्वारिका चली गईं जहाँ सन 1560 में वे भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा गईं। हालाकि कई विद्वान इस मौत के रहस्य को लेकर अलग अलग बाते बताते है।