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शालिग्राम पत्थर

शालिग्राम को भगवान विष्णु का ही एक अवतार माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु के दस अवतार समाहित हैं। पुराणों के अनुसार जिस घर में शालिग्राम स्थापित हो, वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ माना जाता है। शालिग्राम को विभिन्न पूजाओं को शामिल किया जाता है। खासतौर से सत्यनारायण की कथा में भगवान विष्णु के समीप शालिग्राम को स्थापित किया जाता है।

यह आमतौर पर काला और लाल रंग का होता है। शालिग्राम आमतौर पर पवित्र नदी की तली या किनारों से एकत्र किया जाता है। वैष्णव (हिंदू) पवित्र नदी गंडकी में पाया जानेवाला एक गोलाकार, आमतौर पर काले रंग के एमोनोइड (Ammonoid) जीवाश्म को विष्णु के प्रतिनिधि के रूप में पूजते हैं। शालिग्राम भगवान विष्णु का प्रसिद्ध नाम है। 

भगवान विष्णु के शालिग्राम में परिवर्तित होने की दो कथाएं हैं।

शालिग्राम की पहली कथा

एक बार मां लक्ष्मी और सरस्वती के बीच लड़ाई हो गई और गुस्से में माता सरस्वती ने लक्ष्मी को श्राप दिया कि तुम धरती का एक पौधा बन जाओ। मां लक्ष्मी स्वर्ग से पृथ्वी पर तुलसी के पौधे के रूप में विराजमान हो गई

मां लक्ष्मी को स्वर्ग में ले जाने के लिए भगवान विष्णु गंडक नदी में उनका इंतजार कर रहे थे, उस नदी के कुछ शिला पर भगवान विष्णु की दशावतारों के छाप पड़ गए और वे पत्थर शालिग्राम के नाम से प्रसिद्ध हुए।

शालिग्राम की दूसरी कथा

जालंधर नामक एक दैत्य ने तीनों लोको में हाहाकार मचा रखा था। उसकी पत्नी का नाम वृंदा था, जो भगवान विष्णु की परम भक्त थी। जब जलंधर स्वर्ग में देवताओं परआक्रमण के लिए जा रहा था तो वृंदा ने पति की विजय के लिए एक अनुष्ठान रखा।

इस अनुष्ठान के कारण देवता जालंधर को पराजित करने में असमर्थ थे वे भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु जालंधर के वेश में वृंदा के पास गए उन्हें अपने द्वार में देख वृंदा पूजा अनुष्ठान छोड़ उनके पास आई। जैसे ही वृंदा का अनुष्ठान टूटा देवताओं ने जालंधर का सिर काट दिया। जालंधर का कटा सिर वृंदा के समीप आकर गिरा।

पति के कटे सिर को देख वृंदा ने द्वार पर खड़े व्यक्ति के बारे में जानना चाहा, तभी भगवान विष्णु अपने वास्त्विक रूप में आ गए। वृंदा समझ गई कि भगवान विष्णु ने उसके साथ छल किया है। अतः उसने भगवान विष्णु को पत्थर होने का श्राप दे दिया।भगवान विष्णु को पत्थर में परिवर्तित देख मां लक्ष्मी रोने लगीं और वृंदा से उसके श्राप को वापस लेने का निवेदन करने लगी। तब वृंदा ने मां लक्ष्मी के कहने पर अपना श्राप वापस ले लिया तथा पति के संग उसने प्राण त्याग दिए।

वृंदा के शरीर के राख से एक पौधा निकला जिसका नाम भगवान विष्णु ने तुलसी रखते हुए कहा कि आज से मेरा एक रूप इस पत्थर शालिग्राम के रूप में रहेगा, जो तुलसी के साथ पूजा जाएगा। मैं तुलसी के बिना प्रसाद स्वीकार नही करूंगा।

पूजन का शुभ फल

स्कन्द पुराण के अनुसार शालिग्राम और तुलसी की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। प्रतिवर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को तुलशी और शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस पूजा का फल व्यक्ति के समस्त जीवन में पुण्यों और दान के फल के बराबर होता है।