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अर्जुन ने दुर्योधन से क्या वरदान मांगा था

दुर्योधन अपने मित्र कर्ण और भाई दुःशासन के साथ वनवास कर रहे पांडवो को नीचा दिखाने के लिए वन भ्रमण करता है और जहां पांडव निवास कर रहे थे उसी के समीप अपना डेरा डालता है ताकि वह स्वयं वैभव का आनंद ले और पांडव यह सब देखकर ईर्ष्या करें। उस आयोजन के दौरान दुर्योधन का गन्धर्वो से विवाद हो गया और दुर्योधन की अभद्रता ने युद्ध की स्थिति निर्मित कर दी जिससे क्रुद्ध गंधर्वों ने अचानक अवसर पाकर आक्रमण कर दिया जब दुर्योधन और उसके साथी मदिरा के नशे में चूर थे। उस हमले में सभी जान बचाकर भाग गए यहां तक की बड़े महावीर कहे जाने वाले कर्ण भी भाग निकले जबकि दुर्योधन को गंधर्वों ने बंदी बना लिया। दुर्योधन के प्राण संकट में देखकर उसके सारथी ने पास ही निवास कर रहे युधिष्ठिर को सूचना दी और मदद मांगी। युधिष्ठिर ने भीम और अर्जुन को तुरंत आदेश दिया कि वो दुर्योधन की सहायता करें अन्यथा भीम की प्रतिज्ञा अधूरी रह जायेगी। अर्जुन और भीम की विनम्र मध्यस्थता ने गंधर्वों को दुर्योधन को छोड़ने पर विवश कर दिया। इससे क्षुब्ध दुर्योधन ने अर्जुन से इस अहसान के बदले कुछ मांगने को कहा अन्यथा वह इस अहसान के साथ जी नही पायेगा। अर्जुन को कुछ समझ में नही आया तो उसने बाद में मांगने का वचन दे दिया। बात आई-गयी हो गयी और शायद अर्जुन भी इस बात को भूल से गए।

महाभारत युद्ध के दौरान दुर्योधन ने भीष्म पर पक्षपाती युद्ध करने का आरोप लगाया और बहुत ताने मारे कि वह हस्तिनापुर की रक्षा का ढोंग कर रहे हैं जबकी उनकी इच्छा पांडवों को युद्ध जिताने की है। दुर्योधन यह बात जानता था कि भले ही अर्जुन आधुनिक समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर और योद्धा थे लेकिन फिर भी वह भीष्म जैसे अप्रतिम योद्धा को उनकी वृद्धावस्था के बावजूद पराजित नही कर सकते थे और शायद अर्जुन को भी भीष्म के अतिरिक्त कोई परास्त नही कर सकता था। उसके व्यंग्य बाणों से आहत भीष्म ने पांच अभिमंत्रित बाण दुर्योधन को दिए और आश्वासन दिया कि कल इन्ही बाणों से पांडवों का वध कर देंगे। प्रसन्न दुर्योधन उन बाणों को सहेजकर अपने शिविर में ले आया। उसी रात श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दुर्योधन का वर याद दिलाया और उसके बदले इन पांच बाणों को मांग लेने को कहा। हालांकि अर्जुन इन बाणों की कहानी से अनभिज्ञ था किंतु श्रीकृष्ण के कहने पर वो दुर्योधन से बाण मांगने चला गया और दुर्योधन को विवश होकर देने पड़े। साथ ही दुर्योधन ने आश्चर्य जताया कि तुम्हे इनकी जानकारी कैसे हुई, प्रत्युत्तर में अर्जुन ने श्रीकृष्ण का नाम लिया। तब दुर्योधन को श्रीकृष्ण के अंतर्यामी होने का ज्ञान हो गया और उसने अत्यंत निराशा के साथ अपने वचन का पालन किया। आगे क्या हुआ, आपको पता ही है।