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मंदिर जाने का उद्देश्य क्या है

हिन्दुओं के उपासना स्थल को मन्दिर कहते हैं। मन्दिर अराधना और पूजा अर्चना के लिए निश्चित की हुई जगह या देवस्थान है। यानी जिस जगह किसी आराध्य देव के प्रति ध्यान या चिंतन किया जाए या वहां मूर्ति इत्यादि रखकर पूजा अर्चना की जाए उसे मन्दिर कहते हैं। मन्दिर का शाब्दिक अर्थ 'घर' है। वस्तुतः सही शब्द 'देवमन्दिर', 'शिवमन्दिर', 'कालीमन्दिर' आदि हैं।

मठ वह स्थान है जहां किसी सम्प्रदाय धर्म या परंपरा विशेष में आस्था रखने वाले शिष्य आचार्य या धर्मगुरु अपने सम्प्रदाय के संरक्षण और संवर्द्धन के उद्देश्य से धर्म ग्रन्थों पर विचार विमर्श करते हैं या उनकी व्याख्या करते हैं जिससे उस सम्प्रदाय के मानने वालों का हित हो और उन्हें पता चल सके कि उनके धर्म में क्या है। 'मठ' शब्द का प्रयोग शंकराचार्य के काल यानी सातवीं या आठवीं शताब्दी से शुरु हुआ माना जाता है।

 यह अकारण नहीं है कि हमने मंदिर बनाए और देवताओं की प्रतिमाएं बनाकर उनका पूजना आरंभ कर दिया। भारत में मंदिर और प्रतिमाओं के निर्माण के पीछे विज्ञान रहा है। इस विज्ञान को जानने वाले इन प्रतिमाओं के निर्माण को भी तर्कसंगत मानेंगे।

भारत ऐसा देश है, जहां मूर्ति निर्माण का एक पूरा विस्तृत तंत्र था। दूसरी संस्कृतियों ने हमें मूर्ति पूजा करते देखकर गलत समझ लिया कि हम किसी गुड़िया या खिलौने को भगवान मानकर उसकी पूजा करते हैं।

भारत के लोगों को इस बात का पूरा अहसास और जानकारी है कि यह हम ही हैं, जो रूप और आकार गढ़ते हैं। अगर आप इसे आधुनिक विज्ञान के नजरिए से देखें तो आज हम जानते हैं कि हर चीज में एक जैसी ही ऊर्जा होती है, लेकिन दुनिया में हर चीज एक जैसी नहीं है।

उदाहरण के लिए पूर्णिमा और अमावस्या के बीच की रातें एक दूसरे से काफी अलग होती हैं।  हर रात अलग समय पर चंद्रमा निकलता है और हर रात उसका आकार भी अलग-अलग होता है। हालांकि चंद्रमा वही है। हर रात उसका अस्तित्व बदलता नहीं हैं। वही एक चंद्रमा अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रभाव डालता है। अपने अंदर जरा-सा बदलाव लाकर यह कितना फर्क डालता है।

इसी तरह से अगर आप अपने शरीर के ऊर्जा तंत्र में जरा-सा बदलाव कर दें तो यह शरीर जो फिलहाल मांस का लोथड़ा है, वह अपने आप में दिव्य अस्तित्व बन सकता है। योग की प्रणाली भी इसी सोच से प्रेरित है।

कई योगियों ने अपने शरीर को खास तरह से रूपांतरित कर दिया और लोगों को अपने शरीर की पूजा करने की इजाजत दे दी, क्योंकि तब तक उनका शरीर एक दिव्य स्वरूप बन चुका था, जबकि वे खुद उस शरीर में नहीं रहे। यह एक प्रतिष्ठित ऊर्जा थी, जो इस तरीके से तैयार की गई थी।

अपने यहां मूर्ति निर्माण के पीछे एक पूरा विज्ञान है। जहां एक खास तरह की आकृतियां एक खास तरह के पदार्थ या तत्वों से मिलकर बनाई जाती हैं और उन्हें कुछ खास तरीके से ऊर्जान्वित किया जाता है।

अलग-अलग मूर्तियां या प्रतिमाएं अलग-अलग तरीके से बनती हैं और उनमें पूरी तरह से अलग संभावनाएं जगाने के लिए उनमें कुछ खास जगहों पर चक्रों को स्थापित किया जाता है। मूर्ति निर्माण अपने आप में एक विज्ञान है, जिसके जरिए आप ऊर्जा को एक खास तरीके से रूपांतरित करते हैं, ताकि आपके जीवन स्तर की गुणवत्ता बढ़ सके।

भारत के पुरातन यानी प्राचीन मंदिरों के निर्माण पीछे भी एक गहन विज्ञान है। ये मंदिर पूजा के लिए नहीं बनाए गए थे। अगर मंदिर के मूलभूत पक्षों को मसलन-प्रतिमाओं का आकार और आकृति, प्रतिमाओं द्वारा धारण की गई मुद्रा, परिक्रमा, गर्भगृह और प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित करने के लिए किए गए मंत्रोच्चारण आदि में समुचित समन्वय का ध्यान रखा जाए तो एक शक्तिशाली ऊर्जा तंत्र तैयार हो जाता है।

भारतीय परंपरा में कोई आपसे नहीं कहता कि अगर आप मंदिर जा रहे हैं तो आपको पूजा करनी ही होगी, पैसे चढ़ाने होंगे या कोई मन्न्त मांगनी होगी। ये सारी चीजें ऐसी हैं, जो बहुत बाद में शुरू हुई हैं।

पारंपरिक रूप से आपको बताया जाता था कि जब आप मंदिर जाएं तो वहां कुछ देर के लिए बैठें, तब वापस आएं। लेकिन अब आप मंदिर जाते हैं और मंदिर के फर्श पर पल भर के लिए अपना आसन टिकाते हैं और चल देते हैं। मंदिर जाने का यह तरीका नहीं है।

अगर आप मंदिर जा रहे हैं तो आप कुछ देर बैठिए, क्योंकि वहां खासतौर से एक ऊर्जा क्षेत्र तैयार किया गया है। सुबह अपने कामकाज के लिए बाहर निकलने से पहले आप कुछ देर के लिए मंदिर में जरूर बैठें। यह खुद को जीवन के सकारात्मक स्पंदन से भरने का एक बेहतरीन तरीका है, ताकि जब आप घर से बाहर निकलें तो एक अलग नजरिए के साथ हों।

पुराने जमाने में मंदिर भगवान का स्थान या प्रार्थना स्थल के रूप में नहीं बनाए गए थे। न ही कभी मंदिरों में किसी को प्रार्थना कराने की इजाजत दी गई थी। इन्हें एक ऊर्जा स्थल के रूप में तैयार किया गया था, जहां हर कोई जा सकता था और उस ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकता था।


कलियुग में मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ था। पहले सत्य युग, त्रेता युग और द्वापर युग में, भक्त भगवान के साथ सीधे संघ बनाने में सक्षम थे। मंदिरों के महत्व को बढ़ना शुरू हो गया क्योंकि वे परमेश्वर के साथ तालमेल के लिए केंद्र और माध्यम बन गए थे।


भक्त एक मंदिर में भगवान की पूजा पर ध्यान केन्द्रित करना आसान हो जाता है जहां सैकड़ों भक्त उसी उद्देश्य के लिए आते हैं। ईश्वर को नम्रता के साथ संपर्क किया जाना चाहिए, बिना गर्व, सहिष्णुता, सादगी, आत्म-नियंत्रण, ज्ञान की संतुष्टि और स्थिरता की वस्तुओं का त्याग। मंदिर का वातावरण एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करता है जो वांछित उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।

एक मंदिर एक ऐसा स्थान है जहां भक्त जन्म, बुढ़ापे, बीमारी और बच्चों, पत्नी, घर और बाकी दुनिया के साथ उलझने की बुराई की धारणा से मुक्त रहने की कोशिश करता है। मुख्य उद्देश्य पूजा करना है और हर चीज महत्वहीन बन जाती है।

अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है जो वासना और क्रोध का कारण है। ये बुराई भगवान के साथ एक भोज स्थापित करने में बाधा हैं मंदिर के पर्यावरण में, सैकड़ों अन्य भक्तों के बीच, अहंकार की झूठी भावना को वाष्पन करना शुरू होता है और व्यक्ति एक गैर-इकाई बन जाता है। यह राज्य भगवान से पूजा करने का सबसे अच्छा राज्य है जब शरीर और मन एकजुट रहते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि भगवान विश्वास में निहित है। मंदिर एक ऐसा स्थान है जहां लोग मानते हैं कि भगवान मौजूद हैं। यह कारण है कि भगवान अपने भक्तों के लिए मंदिरों में खुद को प्रकट करते हैं। कुछ मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों और उन मंदिरों के चमत्कार को व्यापक रूप से आकर्षित किया जाता है।

भारत में 4 मुख्य तीर्थस्थल केंद्र बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम की तीर्थयात्रा की परंपरा है। अन्य महत्वपूर्ण तीर्थस्थल केंद्र जैसे केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, तिरुपति बालाजी,  वैष्णो देवी, अमरनाथ और अन्य हैं। ऐसे दूर के स्थानों पर जाने के लिए भक्त सभी प्रकार की परेशानी लेते हैं। कठिनाइयों को अपनी मजबूत बनाते हैं और वे स्पष्ट ध्यान देने के साथ आगे बढ़ते हैं

भारतीय परंपरा में, लाखों लोग कुंभ मेले में जाते हैं, जो पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में पूजा करते हैं। कुंभ मेला दुनिया के सबसे बड़े मानव सम्मेलन हैं जहां भक्त की व्यक्तिगत पहचान मानवता के समुद्र में पूरी तरह से डूब जाती है।