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यमराज का दीपक जलाने के कारण एवम विधि

  • दीपावली के दिन यमराज जी के निमित्त जलाया जाता है, मान्यता है कि जिस घर में दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती है
  • सन्ध्या समय मुख्य द्वार पर यम के नाम का दीपक परिवार के सभी सदस्यों के घर आने और खाने-पीने के पश्चात सोते समय जलाया जाता है।
  • इस दीप को जलाने के लिए पुराने दीपक का उपयोग किया जाता है,सबसे वरिष्ठ सदस्य जलाते हैं,
  • इसके पश्चात उस दीपक को पूरे घर में घुमाकर उसे घर से बाहर कहीं रख आते हैं,घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दीपक को नहीं देखते हैं।

यमराज के दीपक जलाने की पौराणिक कथा

प्राचीन काल मे हंसराज नामक एक प्रतापी अपने मित्रों, सैनिकों और अंगरक्षकों के साथ जंगल में आखेट करने गया और सबसे बिछुड़कर अकेला रह गया और भटकते हुए एक अन्य राजा हेमराज के राज्य में पहुंच गया।

हेमराज ने थके-हारे हंसराज का भव्य स्वागत किया, उसी रात्रि हेमराज के यहां पुत्र जन्म हुआ ,इस अवसर पर हेमराज ने राजकीय उत्सव में सम्मिलित होने आग्रह किया,तो राजा हंसराज रुक गए। 

बच्चे के छठवीं के दिन पूजा के समय देवी ने प्रकट हो कर कहा कि हुई - आज इस शिशु के जन्म की जो इतनी प्रसन्नता हैं, यह अपने विवाह के चौथे दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।

इस भविष्यवाणी से समस्त राजमहल में शोक छा गया, राजा रानी पर जैसे वज्रपात ही हो गया।
हंसराज ने राजा हेमराज और उसके परिवार को ढांढस दिया- मित्र, आप तनिक भी विचलित न हों,इस बालक की मैं रक्षा करूंगा,संसार की कोई भी शक्ति इसका बाल बांका नहीं कर सकेगी।

हंसराज ने यमुना के किनारे एक भूमिगत किला बनवाया और उसी के अंदर राजकुमार के पालन-पोषण की व्यवस्था कराई , राजकुमार की प्राणरक्षा के लिए हंसराज ने सुयोग्य ब्राह्मणों से अनेक तांत्रिक अनुष्ठान, यज्ञ, मंत्रजाप आदि की भी व्यवस्था करा दी।

राजकुमार युवा हुआ, उसके गुणों के विषय मे सर्वत्र चर्चा होने लगी, राजा हेमराज ने राजकुमार का विवाह भी एक सुंदर कन्या से कर दिया।

परन्तु प्रारब्ध को परिवर्तित नही किया जा सकता, विवाह के ठीक चौथे दिन यम के दूत राजकुमार के प्राण हरण करने आ पहुंचे, प्रजा भी प्रसन्न थी और राज्य में अभी मांगलिक कर्यक्रम चल ही रहे थे।

राजकुमार और राजकुमारी की मनोहारी छवि देखकर यमदूत भी विचलित हो उठे, किंतु राजकुमार के प्राणहरण का अप्रिय कार्य उन्हें करना ही पड़ा।

राजकुमार के मृत्यु पर क्रंदन का ऐसा हाहाकार मचा और दारुण दृश्य उपस्थित हुआ जिससे द्रवित होकर दूत भी स्वयं रोने लगे।

इसके कारण यमराजजी ने अपने दूतों से पूछा," क्या तुम्हें इस जीव पर इतनी दया आयी कि इसे जीवित रहने दिया जाए"?

इस पर एक दूत ने सिर झुकाकर निवेदन किया- नाथ! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे इस प्रकार की अकाल मृत्यु से प्राणियों को छुटकारा मिल जाए?

इस पर यमराज जी ने कहा-" जीवन और मृत्यु सृष्टि का अटल नियम है तथा इसे बदला नहीं जा सकता" यमुना में स्नान कर, यम का पूजन-दर्शन अकाल मृत्यु से बचाव कर सकता है।

यदि यह संभव न हो तो भी संध्या के समय घर के प्रवेश द्वार पर यम के नाम का एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए, इससे असामयिक मृत्यु और रोग से मुक्त जीवन प्राप्त किया जा सकता है।