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वर्ण विभाजन

प्राचीन सतयुग काल में जब जात पात नहीं थी तो सामान्य रूप से प्राचीन भारतीय लोग रहा करते थे कुछ निश्चित उद्देश्य नहीं होता था। तब ऋषि मुनि जो ब्रम्हज्ञानी थे उन्होंने देखा कि इस उद्देश्य हीन मानव के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि वह देखते थे कि कैसे जीव जन्म लेता है, कैसे मरता है, कहाँ जाता है, कब दोबारा जन्म मिलता है, पृथ्वी पर आने के बाद वह क्या करता है, उसका उद्देश्य क्या है, उसे क्या आवश्यकता है, इस अस्त व्यस्त भौतिक और अभौतिक जीवन को वे अपनी दिव्य दृष्टि से देखते थे। इसलिए उन्होंने मिलकर भारतीयों को एक व्यवस्थित जीवन देने का निर्णय लिया जिसकी मांग भी उन लोगों ने मिलकर की थी क्योंकि वे सब भी समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें और क्या न करें और कैसे करें।

ऋषि जोकि ब्रम्हज्ञानी थे वे जानते थे कि वे स्वयं सहस्रार मे स्थित हैं और अति उच्चता को प्राप्त हैं। उस उच्चता में पहुंचना आसान नहीं घनघोर तपस्या से गुजरना पड़ता है। कई जन्मों की साधना के बाद वह स्थिति उन्हें उपलब्ध होती है। खैर स्वयं के विषय में इतनी जानकारी होने के बाद ही उन्होंने सृष्टि के बारे मे सब जाना। समुद्री कीड़े से लेकर किसी उच्च पशु योनि तक आते आते हजारों वर्ष लग जाते हैं (और लाखों वर्ष पता नहीं) फिर वह उच्च योनि गाय या हांथी की होती है या बाकी स्तनधारी जीव जो समझदार होते हैं जैसे कुत्ता गधा बैल जितने भी आप ढूंढ लेवें। इसके बाद उन्हें जो जन्म मिलता है वह सबसे निम्न स्थिति में मिलता है जोकि ब्रम्हा के घुटनों से पैर तक माने गए हैं क्योंकि पैरों के नीचे सभी जीव आते हैं।

यह निम्म स्थिति का मानव जीवन यापन हेतु छोटा मोटा कोई भी काम करता है और इस तरह तरक्की करते हुए अंत में धार्मिक लाभ करता है। इसी की मृत्यु हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार ऐसे किया जाता है ताकि उसका जन्म ब्रम्हा के घुटनो से ऊपर और छाती के नीचे के स्थानों से हुआ है।

यही वैश्य कहा जाता है। यह व्यक्ति अब होशियार होगा पृथ्वी से जुड़ा होगा सृजन करेगा कमाएगा फिर और कमाने के लिए निर्माण करेगा शिक्षा को नया स्वरूप प्रदान करेगा, और इसीलिए इसे रजोगुण में स्थित कहा जायेगा। यह चाहेगा कि मोह लाये अपने अंदर पर यह इतना व्यस्त होगा दुनिया में की अंत तक समय नहीं दे पाएगा प्रेम नहीं कर पायेगा किसीको पर जो कार्य वह करके जाएगा उससे उसका नाम वर्षों तक याद रखा जाएगा और चलता रहेगा। यह सब मूल हैं। वर्तमान से जोड़कर तुलना मत करें।

अब इसकी मृत्यु के उपरांत उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा विधिवत और उसका अगला जन्म क्षत्रिय के रूप में होगा जोकि ब्रम्हा की छाती और भुजाओं के क्षेत्र से होगा यह अति बलशाली होगा इसमें शुद्र और वैश्य के संस्कार बीज रूप में संग्रहित होंगे पर उसका क्षत्रिय संस्कार उसपर हावी होगा क्योंकि यह उसका वर्तमान का गुण है वह पूर्व जन्मों के गुण भोग चुका है इसलिए उनमें उसका मन नहीं लगेगा। अब वह अपने बाहुबल से ही साम्राज्यों को जीतेगा और साहसतथा शौर्य की नई गाथा लिखेगा। यह मोह ग्रस्त होगा इसपर महिलाएं फिदा रहेंगी और यह उनपर विवाह करेगा तो कई बार इसीलिए इसकी संताने भी होंगी।

इसका भी वो दिन आएगा जब मृत्यु आएगी पर यह ज्यादातर वीरगति से ही मरेगा क्योंकि इसका स्वाभिमान ही इसकी विरासत है।

अब इसी क्षत्रिय पुरूष का अगला जन्म होगा एक ब्राम्हण के रूप में जोकि ब्रम्हा के गले से लेकर माथे तक के क्षेत्र तक का माना जायेगा। अब इस ब्राम्हण पुरूष मे शुद्र/वैश्य/क्षत्रिय के सभी गुण होंगे जोकि संस्कार रूप छिपे होंगे आवश्यकता पड़ने पर ही वह इनका इस्तेमाल करेगा। पर इसका वर्तमान का गुण होगा विद्या, शास्त्र ज्ञान, विज्ञान, विशाल बुद्धि, स्थिरता, खोजने का पागलपन, इसमें ज्ञान की धुन सवार रहेगी। यह निम्न तीन श्रेणियों के कार्य बड़े अच्छे से कर सकता है परंतु उसका मन नहीं लगेगा। वह सिर्फ रहस्य और ज्ञान का पीछा करेगा। और हो सकता है अगर उसे राह मिल गई तो वह स्वयं ब्रम्हज्ञानी तक कि अपनी यात्रा को पूर्ण करेगा।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो दोबारा ब्राम्हण जन्म लेगा और दोबारा वहीं से खोज शुरू करेगा। और लक्ष्य पूर्ति करेगा। नीचे नहीं उतरेगा क्योंकि नीचे आने के लिए इक्षा करनी होगी।

यह सब रहस्य ऋषियों ने स्वयं के द्वारा पूर्ण की गई यात्रा से जाना समझा और पूरी व्यवस्था बनाई। चार जातियां बनाई जिसमें शुद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राम्हण आते हैं।

और इनका ब्रम्हा के क्रमशः पैर, जांघ, भुजा, मुह से जन्म लेने का मतलब है। शुद्र का जीवों से आना तो वह पाताल लोक के सबसे ऊपर के क्षेत्र से आया है। फिर वही मूलाधार, स्वाधिस्ठान, मणिपुर चक्रों से आया है इन चक्रों से संबंध रखता है इसीलिए इनसे संबंधित कार्य ही करता है।

यही जब हृदय चक्र और विशुद्धि से आता है तो क्षत्रिय कहलाता है। और उनसे संबंधित कार्य ही करता है इनमें भुजा बल अथाह होता है।

यही जब यात्रा करता हुआ विशुद्धि और आज्ञाचक्र से आता है तो ब्राम्हण कहते हैं उसे और वह बुद्धि में विशाल होता है।

तो ब्रम्हा के शरीर को चक्र रहस्य के अनुसार ही बताया गया है। आप जितना आसान मनुष्य जीवन को सोंचते हैं और बर्बाद करते हैं आपकी आत्मा ही जानती है कि इसके लिए उसने कितने शरीरों को बदला है इसलिए बिना कुछ जाने जात पात के वैज्ञानिक सिस्टम को गलत मत ठहराएं हाजी पर आज सत्य है कि इस रहस्य को कोई नहीं जानता ईसलिये ऊपर वाले नीचे वालों से उल्टा पुल्टा व्यवहार करते हैं जबकि कभी वह भी उस जाती में था।

अच्छा तो ऋषियों ने व्यवस्था बनाई की ब्राम्हण की शादी ब्राम्हण के घर में ही कि जाएगी जिससे उनके द्वारा जन्मी संतान ब्राम्हण ही पैदा होगी और उसकी आगे की यात्रा सफल होगी ताकि वह ब्रम्हज्ञानी बनकर मुक्ति लाभ करे। ऐसा ही नियम बाकी क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए भी बनाया गया ताकि शुद्र अपने शूद्रों को जन्म देकर उन्हें वैश्य तक पहुंचा सके। बाकी सब भी ऐसे ही।

यही वर्ण व्यवस्था थी जो ऋषियों ने बनाई और जिसका पालन सबने किया क्योंकि इसके बहुत फायदे थे एक ही जन्म में शुद्र के सारे ज्ञान से लाभान्वित होकर उसका अगला जन्म अपने आप वैश्य में होने लगा। और इसी तरह वह एक एक जन्म पाकर ऊपर पहुंचती जाती अंत में उसको समाधि लाभ होता और वह आज्ञाचक्र से सीधे सहस्रार तक कि अपनी यात्रा पूर्ण करता।

सबके कार्य भी ऋषियों ने बता दिए उसी के अनुसार सब अपना अपना ही काम करते। शुद्र अपना, वैश्य अपना, क्षत्रिय अपना, और ब्राम्हण अपना। अब कार्य बताने की आवश्यकता नहीं है।

यह सब इतना अच्छे ढंग से चलने लगा कि कभी कभी तो चमत्कार होने लगा शुद्र जाती में ही जन्म से ही ब्रह्हाज्ञानी जन्म लेने लगे क्योंकि शुद्र माता पिता ब्राम्हण सेवा से ज्ञान लाभ करते और उससे उनके यहाँ अपने आप ब्राम्हण आत्मा आकर्षित होने लगी उनके गर्भ में और वह शुद्र जाती का मान बढ़ाने लगी।

खैर यह सब चलता रहा। कुछ वर्षों बाद सुंदर ब्राम्हण कन्याएं तक आकर्षित होकर शुद्र और वैश्य जातियों में जन्मने लगीं चूंकि प्रकृति सबकुछ अपने हिसाब से करती है वह नियंत्रण करके चलती है इसलिए ऐसा चमत्कार हो जाता। लेकिन गड़बड़ तब होती जब क्षत्रिय राजाओं की नजर पड़ जाती उनपर और वे उनसे विवाह कर लेते।

दरअसल क्या होता है कि आप करते हो कुछ होने लगता है कुछ सृष्टि में कब क्या हो जाये कुछ भी कहना जटिल है।

इसी प्रकार यह यवस्था तीनों युगों को पार करति हुई आ गयी कलयुग में। और फिर बरम शंकरी औलादों का तांता लग गया। क्योंकि वर्ण व्यवस्था बिगड़ गई। जैसे किसी शुद्र ने किसी उच्च जाति से विवाह किया तो उनसे होने वाली संतान बरम शंकरी होने लगी इसका अर्थ है कि जो भी हुआ अब उसका इस जन्म में उद्धार नहीं हो सकता वह बस भौतिकवाद में फ़सकर रह जायेगा न वह ब्राम्हण रहा न शुद्र बीच का होकर रह गया। इससे एक शुद्र जीवात्मा के साथ अन्याय हुआ और एक गर्भ खराब हुआ जिससे वह संतान कभी इस जन्म में ब्रम्हज्ञान को उपलब्ध नहीं हो पाएगी।

वह मानसिक रूप से विक्षिप्त भी हो सकती है ऐसा ज्ञान इस्लाम वालों ने भी फैलाया था भारत में की उच्च जाति की कन्या का गर्भ ले आओ जिससे हमारे यहाँ पैगम्बर पैदा होगा पर पैदा हुआ मिरखींलाल जोकि अपने दिमाग को संभाल ही नहीं पाता क्योंकि उसका शरीर तो उच्च जाति का है पर वह स्वयं जो अंदर जीवात्मा है उसका उत्थान नहीं हुआ है।

यह ऐसा समझे कि i7 हार्डवेयर 8gb ram में आप विंडोज 95 या उससे नीचे का कोई सॉफ्टवेयर डाल दें इतने बड़े घर में आकर वह स्वयं खो जाएगा। यह मेरे अट्टहास करने का वक़्त है क्योंकि कलयुग में मूर्खता के दांव खेले जाते हैं।

अब यह काम सिर्फ भारत में इसलिए हुआ क्योंकि भारत के अलावा दुनिया में कहीं कुछ नहीं था सिर्फ भारत मे ही जीवन की शुरुवात हुई थी। बाकी सब भारत से ही जाकर असुर जातियां जो युद्ध में बच गईं उन्होंने बसाया जाकर। तो दुसरे देशों को भूल जाओ कहीं कुछ नहीं था सिवाय भारत के।

यहीं से सृष्टि शुरू होती है यहीं से खत्म होती है महाप्रलय के साथ।

जाती व्यवस्था के रहस्य बड़े गहरे हैं। अगर शुद्र चाहते हैं कि आपके घर में ब्राम्हण से भी उच्च महाबलशाली आत्मा का जन्म हो तो आज से आप मांस मंदिरा का त्याग कीजिये, वैश्य क्षत्रिय की सेवा नहीं कर सकते तो उनके गुणों का विकास कीजिये ब्राम्हण ज्ञान खोजिए उसका अध्ययन कीजिये। ब्राम्हण के गुणों का विकास कीजिये। धर्मशील बनिये, संवेदनशील बनिये देखिए आपका जीवन कैसे खिल जाएगा।

परंतु सबको शॉर्टकट पसंद हैं यह सब भी न करना पड़े और काम हो जाये तो यह असंभव है। जितना भी पश्चिम में विकास आप देख रहे हैं वह यूनानियों और यहूदियों की देन है जिसकी जड़ें भारत से जुड़ीं है खोदना नहीं है मुझे।

इस वर्ण व्यवस्था के कारण ही भारत में इतना विकास हुआ लाखों वर्षों पहले असल में जीवन तो हमारे पूर्वजों ने जिया है क्योंकि उन्होंने ब्रम्हज्ञान तक कि यात्रा की है। उन्होंने कृष्ण से भक्ति रहस्य चखे हैं। श्रीराम के जन्म से अयोध्या भूमि महकी है यह सब कैसे संभव हुआ सिर्फ समर्पण से वो भी वर्ण व्यवस्था की वजह से इसमें हर जाति का फायदा हुआ।