द्रुपद ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ किया तो उसे पुत्र धृष्टद्युम्न की प्राप्ति हुई। यह यज्ञ महाराज द्रुपद ने द्रोणाचार्य से अपने अपमान का बदला लेने के लिये संतान-प्राप्ति के उद्देश्य से किया था। धृष्टद्युम्न का जन्म
देवताओ ने द्रुपद की श्रद्धा देख उसे फलस्वरूप एक पुत्री देने का निश्चयः किया। पर द्रुपद पहले पुत्र को प्राप्त कर चुका था तो उसने यज्ञ की अग्नि में आहुति देने से मना कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि पुत्री उसे कुछ नही दे सकती जबकि पुत्र उसका वंश आगे बढ़ायेगा ओर उसकी ओर से द्रोणाचार्य का विनाश करेगा।
लेकिन देवताओ ने द्रुपद को अग्नि में आहुति देने के लिए बाध्य किया। तब द्रुपद ने गुस्से में ऐसी पुत्री की मांग की जिसका जीवन कष्टो से भरा हो, जिसमे प्रतिशोध की भावना कूट कूट कर भरी हो। दुनिया भर का अन्याय हो उसके साथ, पर फिर भी वो न्याय स्थापित करने के लिए जानी जाय। लेकिन जो अग्नि की तरह पवित्र हो। उसने सोचा देवता उसकी ये इच्छा पूरी नही कर पायंगे। लेकिन विपरीत इसके देवताओ का प्रसाद, अग्नि से जन्म लेकर आई "द्रोपदी" । चूँकि द्रोपदी का जन्म यज्ञ के प्रज्त्रलित अग्निकुंड से हुआ था अतः वह यज्ञसेनी भी कहलाई।
लेकिन ये सत्य है कि उसके पिता की इच्छा के फलस्वरूप ही द्रोपदी का जीवन कष्टो से भरा था।