Home » Blog »For-Hapiness-of-Pitr

पितरों की प्रसन्नता के लिए

पितरों को प्रसन्न करते हुए उनकी अनुकम्पा का पात्र बनने के लिए, हमारे ऋषियों ने वर्ष के पन्द्रह दिन निश्चित किए हैं, जो पितृपक्ष के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन पन्द्रह दिनों में, देवी- देवताओं के निमित्त किये गए किसी भी प्रकार के हवन, यज्ञादि कर्मों का सम्पूर्ण फल भी, हमारे पितरों को ही मिला करता है।

ऐसा प्रकृति के नियमों के कारण स्वत:स्फूर्त होता है; इस अवधि में देवी-देवताओं का आवाहन करने के कारण, हमें पितरों का आशिर्वाद नहीं मिलता। इसीलिए, पितृपक्ष में देवी-देवताओं के हवन- यज्ञादि नहीं किए जाते। पितृपक्ष के पन्द्रह दिनों पर केवल पितरों का ही अधिकार रहता है, देवी-देवता इस समयावधि में निष्क्रिय रहा करते हैं।
  • प्रत्येक अमावस्या को किसी असहाय, भूखे को भोजन करा देने मात्र से वे प्रसन्न हो जाते हैं एवं हमारी इस दया भावना के कारण, हमें आशिर्वाद भी अवश्य ही देते हैं।
  • सूर्य को प्रतिदिन जल से अर्घ्य देने से भी, हमारे पितर हमसे सन्तुष्ट रहते हैं।
  • घर की दक्षिणी- पश्चिमी दीवार पर अपने पितरों, पूर्वजों के चित्र लगाना चाहिए। यह दिशा उन्हीं के लिए निर्धारित है।
  • वर्ष में दो बार, होली जलने से एक दिन पूर्व एवम् श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन, प्रात: वेला में, अपने कुल देवता की पूजा-अर्चना करने से भी हमारे पितर प्रसन्न हो कर हम पर आशिर्वाद की वर्षा करते हैं।
  • लोकहित में, कुआं- तालाब बनवाने से भी पितर तृप्त होते हैं।
  • पीपल के पौधे का रोपण करके, उसकी देखभाल करनेवाले के पितर, सुखी होकर अपने वंश की वृद्धि करते हुए, समृद्धि प्रदान करते हैं।
  • कौवों को खीर या दूध- भात खिलाने से भी पितर तृप्त होते हैं।
  • संध्या समय, तुलसी के पौधे के निकट घी के दीप जलाने से भी पितरों को शान्ति मिलती है।