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दक्षिणा मे एक अतिरिक्त रुपया

प्राचीन काल मे भगवान की पूजा कराते समय आचार्य द्वारा यजमान से सवाया चढ़ाने का निर्देश दिया जाता दक्षिणा स्वरूप सवा रुपए का ही विशेष महत्व बताया जाता था।

पच्चीस पैसे के बंद होने से अधिकतर स्थानों पर यजमान एक रुपए का नोट बढ़ा कर निकालते हैं जैसे 11, 21, 51 ,101 रुपए देते हैं क्योंकि विषम संख्या में सवाया शगुन न होने से पूजा कराने वालों के मन में कुछ आशंका बनी ही रहती है।

एक अतिरिक्त रुपया देने के कारण

  • प्रभु को स्मरण करके सर्वप्रथम उसे एक रुपया बढ़ा कर दान देते है क्योंकि एक के बढ़ने की संभावनाएँ अंनत है , ये एक ईश्वर को निहीत है तथा ईश्वर का रूप भी माना जाता है , ईश्वर आदि भी है और अनन्त का आरंभ भी है।
  • एक को अधिक देने से वह राशि अंनत राशि का प्रतीक हो जाती है कि ये प्रदर्शित करता है कि हम आपका सम्मान करते है और ये एक अधिक बढ़ाने से हम ये भी बता देते है कि अभी हमारी सामर्थ्य इतनी ही है।
  • इसका अर्थ यह निकलता है कि उसके द्वारा दी जाने राशि श्रद्धायुक्त है और यदि वो एक रुपया नही देता तो अर्थ ये हुआ कि वो राशि उस व्यक्ति की आर्थिक सामर्थ्य का प्रदर्शन मात्र है, जो अहंकार को बढ़ाने वाला है।
  • इस प्रकार से यह भी सिद्ध होता है कि उस व्यक्ति के लिए एक रुपया भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि शेष राशि, इसलिए इस राशि के प्रत्येक अंश का सदुपयोग ही किया जाना चाहिए।
  • यह भाव हो सकता है कि जिस प्रकार एक रुपये के रूप में कुछ अधिक देने का प्रयास कर रहे हैं, ईश्वर हमारे भाव को समझ कर हमारी आशा से अधिक ही देंगे।
  • यदि संख्या सम हो तो अंत मे शून्य आ सकता है क्योंकि शून्य की कोई शुभता न होती ,क्योंकि शून्य के साथ किसी संख्या का गुणा करने पर गुर्णनफल सदैव शून्य आता है।
  • सभी मांगलिक कार्य प्रायः विषम संख्या में किए जाते हैं जैसे परिक्रमा आरती , उस दृष्टि से हम राशि को भी प्रायः विषम संख्या में देने का प्रयास करते हैं।
  • भारतीय संस्कृति में ऐसी हजारों पुरानी परम्परायें हैं, जो ऊपर से देखने में व्यर्थ और तुच्छ लगती हैं, परन्तु गहनता से विचार करने पर हमें उनका मर्म और उनकी उपयोगिता ज्ञात होती है।
  • यह सम्भव है कि हमारे अज्ञान के कारण और काल के प्रभाव से उन परम्पराओं में कुछ विकृतियाँ आ गयी हों, परन्तु हमे उन विकृतियों को दूर कर उनका लाभ उठाना चाहिए।
  • यह केवल मानसिक रूप से सोचने के ऊपर भी निर्भर करता है ईश्वर हमारे दान देने या नही देने से अधिक हमारी भावना को देखते हैं।