भगवान कृष्ण के पहले "इंद्रोत्सव" नामक उत्तर भारत में एक बहुत बड़ा त्योहार होता था। भगवान कृष्ण ने इंद्र की पूजा बंद करवाकर गोपोत्सव, रंगपंचमी और होली का आयोजन करना शुरू किया। भगवान श्रीकृष्ण का मानना था कि ऐसे किसी व्यक्ति की पूजा नहीं करना चाहिए जो न ईश्वर हो और न ईश्वरतुल्य हो। गाय की पूजा इस लिए क्योंकि इसी के माध्यम से हमारा जीवन चलता है। होली उत्सव इसलिए क्योंकि यह सत्य की असत्य पर जीत का प्रतीक है। रंगपंचमी जीवन को उत्सव और खुशियों से भरने का त्योहार है।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि हमारे आस-पास जो भी चीजे हैं उनसे हम बहुत ही प्रेम करते हैं जैसे गायें, पेड़, गोवर्धन पर्वत (तब गोवर्धन पर्वत साल भर हरा घास, फल मूल एवं शीतलजल को प्रवाहित करता था)। भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में 'ये सब हमारी जिंदगी हैं। यही लोग, यही पेड़, यही जानवर, यही पर्वत तो हैं जो हमेशा हमारे साथ हैं और हमारा पालन पोषण करते हैं। इन्हीं की वजह से हमारी जिंदगी है। ऐसे में हम किसी ऐसे देवता की पूजा क्यों करें, जो हमें भय दिखाता है। मुझे किसी देवता का डर नहीं है। अगर हमें चढ़ावे और पूजा का आयोजन करना ही है तो अब हम गोपोत्सव मनाएंगे, इंद्रोत्सव नहीं।'
भगवान श्रीकृष्ण के निवेदन पर स्वर्ग के सभी देवी और देवताओं की पूजा बंद हो गई। धूमधाम से गोवर्धन पूजा शुरू हो गई। जब इंद्र को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने प्रलय कालीन बादलों को आदेश दिया कि ऐसी वर्षा करो कि ब्रजवासी डूब जाएं और मेरे पास क्षमा मांगने पर विवश हो जाएं। जब वर्षा नहीं थमी और ब्रजवासी कराहने लगे तो भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण कर उसके नीचे ब्रजवासियों को बुला लिया। गोवर्धन पर्वत के नीचे आने पर ब्रजवासियों पर वर्षा और गर्जन का कोई असर नहीं हो रहा था। इससे इंद्र का अभिमान चूर हो गया। बाद में भगवान श्रीकृष्ण का इंद्र से युद्ध भी हआ और इंद्र हार गए। तब ही से इंद्र की पूजा का प्रचलन नहीं है।