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होली की कथा में छिपा साधको के लिए सन्देश

होली की कहानी की व्याख्या किसी विचारक ने साधना के मार्ग पर चलने वाले एक योग्य एक साधक के सामने आने वाली कठिनाइयों के रूप में दर्शाते हुए की है जिसके अनुसार -

होली की कथा से जुड़े दो भाइयों के नाम है - हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप जो कि काफी अधिक रोचक है।

हिरण्य शब्द का अर्थ होता है सोना जिसे माया का प्रतीक माना जाता है, तथा अक्ष शब्द का अर्थ होता है आंखें, अतः हिरण्याक्ष का अर्थ होता है साधक का माया (सोने) के प्रति आकर्षण। ऐसा माना जाता है कि साधना के पथ पर आगे बढ़ने के लिए एक साधक को माया में नहीं फंसना चाहिए। इसलिए माया के आकर्षण को असुर के रूप में दर्शाया गया है। 

हिरण्याक्ष का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने वराह (सूअर) का रूप धारण करके अवतार लिया। तथा एक भयंकर युद्ध में उसका वध कर दिया। हिरण्याक्ष - वराह का यह युद्ध प्रेरणा देता है कि जिस प्रकार एक जानवर के रूप में सूअर एक खेत को चीर देता है, उसी प्रकार एक साधक को भी माया के आकर्षण रुपी विरोध को चीर कर आगे बढ जाना चाहिए। ये लड़ाई बिलकुल एक साधक में उपस्थित अच्छे और बुरे गुणों के बीच होने वाले युद्ध जैसी है।

जैसे ही कोई व्यक्ति साधना के पथ पर अग्रसर होता है, उसकी कुंडलिनी जागृत होने लगती है और शरीर तेजवान होकर आकर्षक दिखने लगता है। हमारे सभी भगवान जैसे राम, कृष्ण, विष्णु को अति सुंदर रूप में दर्शाया गया है। होली की कथा का एक पात्र है हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकश्यप जिसका अर्थ है - हिरण्य अर्थात सोना और कश्यप अर्थात कपड़ा या देह। अतः हिरण्यकश्यप मतलब जिसका शरीर सोने की तरह आकर्षक है।

जैसे-जैसे एक साधक अपनी साधना के मार्ग पर आगे बढ़ता है, उसमें अहंकार की वृद्धि होने की सम्भावना भी बढ़ने लगती है। इसी को हिरण्यकश्यप के रूप में दर्शाया गया है जो भगवान विष्णु के स्थान पर स्वयं की पूजा कराने लगता है। कथा का प्रमुख पात्र है हिरण्यकश्यप का पुत्र जिसका नाम प्रह्लाद (प्र + आह्लाद ) है, जिसका अर्थ है अत्यधिक आनंद।

साधना के पथ पर चलने वाला एक साधक जब अपने इष्ट देव को देखता है तो अत्यधिक आनंद का अनुभव करता है। प्रह्लाद को उसके पिता / बुआ (होलिका) द्वारा मारने का प्रयास साधक में उपस्थित अच्छे और बुरे गुणों के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। साधना के पथ पर चलने वाले साधक को अपनी यात्रा में काम, क्रोध, मद, लोभ जैसे अनेक दुर्गुणों से भी संघर्ष करना होता है, ये बुरे गुण साधक के अच्छे गुणों को दबाने की कोशिश करते हैं।

होली की तरह ही सभी वैदिक त्योहार अपने आप में एक गहरा अर्थ रखते है और हमारे महान ऋषि-मुनियों द्वारा इनके माध्यम से मनुष्य को उसके जीवन के अंतिम लक्ष्य की और केंद्रित रखने का एक प्रयास है।