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भक्त की प्रतीक्षा में श्री कृष्ण बने विट्ठल भगवान

भगवान  कृष्ण ही विट्ठल नाम से जाने जाते है। महाराष्ट्र में एक बहुत ही मातृ पितृ भक्त, पुण्डलिक हुए है। वे प्राण पण से अपने माता पिता की सेवा में लगे रहते थे। उनकी मातृ पितृ भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर एक बार स्वयं भगवान श्री कृष्ण उनके सम्मुख प्रकट हो गए। उस समय पुण्डलिक हमेशा की तरह अपने माता पिता की सेवा लगे हुए थे।

भगवान को आया देखकर पुण्डलिक ने एक ईंट भगवान की ओर सरका दी और कहा, "आप थोड़ी प्रतीक्षा करें। मैं माता पिता की सेवा पूर्ण कर आपसे भेंट करूँगा। भगवान ईंट पर खड़े होकर पुण्डलिक की प्रतीक्षा करने लगे। ईंट पर खड़े होने के कारण भगवान का नाम हुआ ईठठल जो कालांतर में विठ्ठल या विठोबा हो गया। 

महाराष्ट्र के पंढरपुर में इन्ही भगवान विठ्ठल की मूर्ति है। पुण्डलिक के कारण ही भगवान का नाम पंढरीनाथ और स्थान का नाम पंढरपुर हुआ। आषाढ महीने में देवशयनी एकादशी व कार्तिक महिने की देवउठनी एकादशी के दिन यहाँ पर लोग विशेष पूजा करने के लिए आते है। श्री तुकाराम महाराज के गांव ग्राम देहु में भी इन्ही विठ्ठल भगवान का मंदिर है, जो तुकाराम जी के पितामह विश्वम्भर बोवा जी ने बनवाया था। वैराग्य होने पर तुकाराम जी ने अपनी आध्यात्मिक यात्रा इसी मंदिर के जीर्णोद्धार से की थी और अपनी अपूर्व अलौकिक भक्ति के बल पर सदेह ईश्वर प्राप्ति की थी।

इस विषय मे श्री लक्ष्मण पंगारकर जी का ग्रंथ पठनीय है। श्री विठ्ठल के अनेक महान भक्त महाराष्ट्र प्रदेश में हुए जिनमे संत ज्ञानेश्वर के पिता श्री विठ्ठल पंत, संत ज्ञानेश्वर, संत एकनाथ, नामदेव, दामाजी पंत और संत तुकाराम प्रमुख है।