धार्मिक नियमों क्रियाओं में कुछ ऐसी परम्पराएं होती हैं जो समय के साथ लोगो को अव्यवहारिक लगने लगती ही किन्तु हमारे महापुरुषों ऋषि मुनियों ने इनका निर्माण बहुत सोच समझ कर किया था। ऐसी ही एक धार्मिक परंपरा है कि किसी भी मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद में बाहर आ करके मंदिर की पैड़ी या ऑटले पर कुछ देर के लिए अवश्य बैठना चाहिए। इस परंपरा को बनाने का कारण निम्नलिखित है।
यह एक प्राचीन भारतीय परंपरा है जो कि एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। इस लोक को मनन करें और आने वाली पीढ़ी को भी बताएं। श्लोक इस प्रकार है।
अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्॥
इस श्लोक का अर्थ है -
अनायासेन मरणम् का अर्थ होता है कि बिना परेशानी के हमारी मृत्यु हो और हमें कभी भी बीमार हो करके बिस्तर पर न पड़ना पड़ें, चलते फिरते ठीक ठाक हालत में ही हमारे प्राण निकल जाएं और हमें कभी भी कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त न करना पड़े।
बिना देन्येन जीवनम् का अर्थ परवशता का जीवन ना जीना पड़े। कभी किसी पर पूर्णतया निर्भर न हो जाना पड़े। जिस प्रकार लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है। वैसी विवशता या बेबसी का सामना न करना पड़े। भगवान जी की कृपा से बिना भीख के जीवन यापन हो सकें।
देहांते तव सान्निध्यम् का अर्थ है जब कभी भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। प्रभु के दर्शन करते हुए ही उनके प्राण निकले थे।
देहि में परमेश्वरम् का अर्थ है कि हे परमेश्वर हमें ऐसा वरदान देना।
भगवान से विनय - प्रार्थना करते हुऐ उपरोक्त श्र्लोक का पाठ करें। गाड़ी, घोड़ा, लड़का, लड़की, पति, पत्नी, घर, धन इत्यादि अर्थात् सांसारिक वस्तुएं उनसे नहीं मांगनी चाहिए, यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। क्योंकि यह एक प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए की जाती है। जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है।
'प्रार्थना' शब्द के 'प्र' का अर्थ होता है 'विशेष' अर्थात् विशिष्ट, श्रेष्ठ और 'अर्थना' अर्थात् निवेदन। इस प्रकार प्रार्थना का अर्थ हुआ विशेष निवेदन।
मंदिर में भगवान का दर्शन हमेशा खुली हुई आंखों से करना चाहिए, उनको निहारना चाहिए। उन्हें निहारकर उनको मन में बसाने का प्रयास करते हुए कुछ पल के लिए आँखें मूँद कर उनका ध्यान करना चाहिए। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का, संपूर्ण आनंद लेंकर, उनके निज-स्वरूप को आंखों में भर लेना चाहिए।
फिर दर्शन के बाद में जब बाहर आकर बैठें, तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किया हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। मंदिर से बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठ कर स्वयं की आत्मा का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर निज आत्मस्वरूप ध्यान में भगवान नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और एक बार पुन: दर्शन करें।
॥ सत्यम परम् धीमहि ॥