Home » Blog »Fake Sympathy Tends To Rebirth As Vulture And Jackal

शोक के आडम्बर से मिलती है गिद्ध और सियार की गति

एक ब्राह्मण को शादी के बहुत सालों के बाद पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन कुछ ही वर्षों के बाद में उस बालक की असमय मृत्यु हो गई। वह ब्राह्मण जब बेटे के शव को लेकर श्मशान पहुँचा तो वह मोह के कारण उसको दफना नहीं पा रहा था। उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए गये अपने  जप-तप और पुत्र का जन्मोत्सव याद आ रहा था। 

उसी श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार भी रहते थे। वे दोनों ब्राह्मण बालक के शव देखकर बड़े खुश हुए। दोनों ने अपनी एक व्यवस्था बना रखी थी जिसके अनुसार दिन में सियार माँस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध। ब्राह्मण को असमंजस्य की स्थिति में देखकर सियार ने सोचा - अगर यह ब्राह्मण दिन में ही अपने बेटे का शव यहां रखकर चला गया तो उस पर गिद्ध का अधिकार हो जाएगा। इसलिए क्यों न जब तक अंधेरा हो ब्राह्मण को बातों में उलझाकर रखा जाए। वहीं गिद्ध सोच रहा था कि शव के साथ में आए ब्राह्मण के साथी कुटुम्बी लोग जल्दी से चले जाएँ तो वह उसको खा लेगा।

गिद्ध ब्राह्मण के पास गया और उससे वैराग्य की बातें करने लगा। गिद्ध ने ब्राह्मण से कहा - हे मनुष्यों, तुम्हारे दुखों का कारण यही मोहमाया है। दुनिया में आने से पहले ही प्रत्येक जीव की आयु निर्धारित हो जाती है। संयोग और वियोग तो प्रकृति के नियम हैं। तुम चाह कर भी अपने पुत्र को वापस नहीं ला सकते हो। इसलिए शोक का त्याग करके प्रस्थान करें। संध्या का समय होने वाला है जो कि श्मशान में प्राणियों के लिए भयकारी  होता है इसलिए आपके लिए शीघ्र प्रस्थान करना हितकर है।

गिद्ध की ज्ञान वैराग्य वाली बातें ब्राह्मण के साथ आए रिश्तेदारों को बहुत अच्छी लगीं। सभी लोग ब्राह्मण से बोले - बालक के जीवित होने की कोई आशा नहीं है। इसलिए अब यहाँ रुकने का क्या लाभ है? सियार भी ये सब बातें सुन रहा था। जब उसको गिद्ध की चाल कामयाब होती दिखाई दी  तो वो भागकर ब्राह्मण के पास में आया। सियार कहने लगा - बड़े निर्दयी पिता हो। कभी जिससे इतना प्रेम करते थे, आज उसकी मृत-देह के साथ में कुछ समय नहीं बिता सकते!! क्या तुम नहीं जानते कि जीवन में फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे। कम से कम संध्या होने तक तो  इसको रुककर जी भर के देख लो!

ब्राह्मण के साथ आये लोगो को रोके रखने के लिए सियार ने नीति नियमों की बातें छेड़ दीं - जो रोगी हो, जिस पर अभियोग लगा हो और जो श्मशान की ओर जा रहा हो उस व्यक्ति को बंधु-बांधवों के सहारे की बहुत ज़रूरत होती है। सियार की इन बातों से परिजनों को भी  कुछ तसल्ली हुई और उन्होंने तुरंत वापस लौटने का विचार टाल दिया।

अब उत्पन्न इस स्थिति से गिद्ध को परेशानी होने लगी। उसने कहना शुरू किया - तुम सभी लोग ज्ञानी होने के बाद भी एक कपटी सियार की बातों से भ्रमित हो रहे हो। क्या तुम सब नहीं जानते कि एक दिन हर प्राणी की यही दशा होनी है। शोक त्यागकर अपने-अपने घर को जाओ। जो बना है वह नष्ट होकर ही रहता है। तुम्हारा मोह और शोक मृतक को दूसरे लोक में भी कष्ट देगा। जो मृत्यु के आगोश में जा चुका है क्यों रोकर उसे व्यर्थ में  कष्ट देते हो?

जैसे ही लोग चलने को तैयार हुए तो सियार फिर से शुरू हो गया - अगर यह बालक जीवित होता तो क्या तुम्हारा वंश न बढ़ाता? अरे निर्मोहियों कुल का सूर्य अस्त हुआ है कम से कम सूर्यास्त तक तो रुक जाओ!

अब गिद्ध को चिंता हो गयी। गिद्ध ने कहा - मेरी आयु भी सौ वर्ष की हो चुकी है। लेकिन मैंने आज तक किसी को जीवित होते नहीं देखा है। तुम्हें शीघ्र जाकर इसकी आत्मा के लिए मोक्ष का कार्य आरंभ करना चाहिए। सियार ने कहना शुरू किया - जब तक कि सूर्य आकाश में विराजमान हैं, दैवीय चमत्कार होने की सम्भावना हैं। रात्रि में आसुरी शक्तियाँ काफी अधिक प्रबल हो जाती हैं। इसलिए मेरा सुझाव है कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए।

सियार और गिद्ध की चालाकीयों में फँसा ब्राह्मण परिवार निर्णय नहीं ले पा रहा था कि क्या करना चाहिए। अंततः ब्राह्मण पिता ने बेटे का सिर अपनी गोद में रख लिया और ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगा। उसके विलाप से श्मशान काँपने लगा। उसी समय संध्या-भ्रमण पर निकले महादेव-पार्वती वहाँ पहुँच जाते है। पार्वती जी ने जब रोते बिलखते परिजनों को देखा तो वह दुखी हो गईं। उन्होंने महादेव से बालक को जीवित करने का अनुरोध किया।

महादेव प्रकट हुए और उन्होंने उस बालक को सौ वर्ष की आयु दे दी। गिद्ध और सियार दोनों ठगे रह गए। गिद्ध और सियार के लिए तब एक आकाशवाणी हुई - तुमने प्राणियों को उपदेश तो दिया मगर उसमें सांत्वना के बजाय तुम्हारा निजी स्वार्थ निहित था। इसलिए तुम दोनों को इस निकृष्ट योनि से शीघ्रता से मुक्ति नहीं मिलेगी।

दूसरों के कष्टों पर सच्चे मन से शोक करना चाहिए। शोक का आडंबर करके प्रकट की गई संवेदना से गिद्ध और सियार की गति प्राप्त होती।