Home » Blog »Gopio ka Prem Udhav ke gyan par bhari

गोपिओं का प्रेम उद्धव के ज्ञान पर भारी

एक बार उद्धव जी को अपने योग और ज्ञान पर अभिमान हो गया वे बार भगवान् श्री कृष्ण को भी अपने ज्ञान और योग की भी सीख देने लगे उद्दव जी के इस प्रकार के व्यवहार को भगवान् श्री कृष्ण समझ गए और भगवान् ने उद्धव जी का अभिमान तोड़ने के लिए उन्हें अपने पास बुलाकर कहा की है ऊधो ब्रज में श्री राधा जी और समस्त गोपांगनाये जो मेरी प्रतीक्षा कर रही है उनको योग और ज्ञान की शिक्षा देकर आओ उन्हें समझाओ के वे मेरी प्रतीक्षा अब न करे भगवान् श्री कृष्ण की आज्ञा लेकर उद्दव जी ब्रज के लिए रवाना हो गए जैसे ही ब्रज में प्रवेश किया तो देखते है श्री यमुना जी के घाट सूने पड़े है अब वहां कोई गोपी जल लेने नही आती थोडा और आगे चलकर देखते है जहाँ भगवन श्री कृष्ण ब्रज धेनुओं का दूध दुहा करते थे वहां गाये रंभा रंभाकर मानो भगवान् को बुला रही हो थोडा और आगे चलते है तो नन्द बाबा का निवास स्थल आता है उद्धव जी रथ से निचे उतरते है और नन्द बाबा के घर में प्रवेश करते है जहाँ वृद्ध हो चुके नन्द बाबा उद्धव जी की आवाज को पहचान लेते है और माँ यशोदा को आवाज देते है अरी देख कौन आयो है ऊधो आ गयो है और जैसे ही मैया यशोदा के कानों में उद्धव जी के आने की आवाज पहुंची वे तेजी से घर के आँगन में आ गयी और इस से पहले नन्द बाबा कुछ बोल पाते कांपते हाथों से उद्धव जी का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी अरे लाला मेरो कनुआ कैसो है कुशल तौ है न लाला ने का सन्देश भेजो है हमकू कछु कही है का कब आयेगो हमारो कनुआ और इस प्रकार माँ यशोदा बोलती ही जा रही थी और उद्धव जी नन्द बाबा और माँ यशोदा जी की ये दशा देखकर व्यथित हो गए कुछ बोल पाते इतने में ही यशोदा जी उद्धव जी का हाथ पकड़कर उन्हें अंदर ले गयी जहाँ वे माखन मथा करती थी और इशारा कर उद्धव जी को वो ऊखल दिखाने लगी और कहने लगी के वो ऊखल देख रहे हो उद्धव कभी में अपने बाल गोपाल को जब वो माखन चुराता था तो इसी ऊखल से बाँध दिया करती थी कितनी बावली थी में तुम वापस जाकर गोपाल से कहना के वो वापस आ जाए अब में उसे कभी नही बांधूंगी देखिये एक माँ की ममता यशोदा जी के लिए श्री कृष्ण जो तीनो लोको के स्वामी है काल भी जिनसे काँपता है उन्हें अभी भी एक साधारण बालक समझ रही है और कहती है के मेरे लाला तै कीजो के अब में बाते कछु नाय कहूँगी वू सब माखन मटकी फोड़ देगो तो भी में बाय अब नाय बांधूंगी अब में कछु दण्ड मेरे लालाय न दाऊगी बस मेरो प्यारो कन्हैया लौट कै नंदगाम आ जाए और इस प्रकार यशोदा जी की आँखों से आंसू आने लगे और बड़ी उत्सुकता से उद्धव जी से पूछने लगी के बड़े दिनन के बाद उधो तुम यहाँ आये हो इस बूढी माँ के लिए मेरे कनुआ ने क्या भेजा है और फिर खुद ही बोल पड़ी कितनी पागल ही हूँ में भी मेरा कनुआ अब कनुआ कहाँ रहा मथुरा जा कर अब तो वो वासुदेव श्री कृष्ण बन गया है उद्धव जी कुछ समझ नही पा रहे थे और अंत में भगवान् श्री कृष्ण द्वारा दी गयी वो पाती अर्थात चिठ्ठी पढ़कर मैया यशोदा और नन्द बाबा को सुनाने लगते है जिसमे भगवान् ने लिखा था मैया और और बाबा कू प्रणाम, आगे भगवान् ने लिखा के मैया में लाख जतन भी करूँ तो भी आपका ऋण नही चुका सकता आपके लाड दुलार और नन्द बाबा के स्नेह का में सर्वदा ऋणी रहूंगा जब ब्रज में था तो हर प्रकार का आनंद और सुख जो मुझे मिला वो मथुरा में दुर्लभ है यहाँ मेरा नाम श्री कृष्ण हो गया है यहाँ मुझे कनुआ गोपाल और कन्हिया कहकर कोई नही पुकारता ब्रज में तो सब मुझे कनुआ कहकर बुलाते थे जितना अधिक स्नेह मुझे कनुआ और गोपाल पुकारने पर अनुभूत होता था वो अब श्री कृष्ण में तनिक भी नही मिलता भगवान आगे लिखते है के जब में ब्रज में सोकर उठा करता था तो प्रातकाल मैया मुझे उठाकर मेरा मुहँ साफ़ कर मुझे कुल्ला करवाया करती थी और कलेऊ करने के लिए मुझे खाने को माखन देती लेकिन यहाँ मुझे माखन खिलाने वाला कोई नही है ब्रज में मेरे सखा सुमंगल श्रीदामा और अन्य ग्वाल बाल जो मेरे हृदय में बसा करते थे जो मुझ से हंसी ठिठोली किया करते थे अब यहाँ मथुरा में मुझ से हंसी ठिठोली करने वाला कोई नही है उद्धव जी जब भगवान् श्री कृष्ण द्वारा भेजी गयी चिठ्ठी जब पढ़ रहे थे तो मानो नन्द बाबा और मैया यशोदा को अत्यधिक पीड़ा अनुभव हो रही थी ऐसा जानकर उद्धव जी ने चिठ्ठी पढ़ना बंद कर दिया और माँ यशोदा और नन्द बाबा से आज्ञा लेकर ब्रज गोपियो के घरों की और प्रस्थान किया और मार्ग में ही उन्हें ब्रज गोपांगनाये मिल गयी और सभी ने उद्धव जी को प्रणाम किया गोपियों को देखकर उद्धव जी कहने लगे हे ब्रज गोपियो में तुम्हे परम ब्रम्ह ज्ञान का उपदेश और उसकी महत्ता जा रहा हूँ इस से पहले श्री कृष्ण ने आप सब के लिए एक चिठ्ठी भेजी है जिसे में आपको पढ़कर सुनाने जा रहा हूँ गोपियो ने जैसे ही भगवान् का नाम सूना तो सावधानी पूर्वक उद्धव की बातें सुनने लगी और उद्धव जी ब्रज गोपियों को वो चिठ्ठी पढ़कर सुनाने लगे जिस पर श्री कृष्ण ने लिखा था कि " मैं अब वापस नहीं आऊंगा तुम सभी मुझे भूल जाओ और योग में ध्यान लगाओ " गोपियो ने जैसे ही श्री कृष्ण को भूल जाने वाला उपदेश सूना तो तुरंत उद्धव जी को वो चिठ्ठी आगे पढ़ने से रोक दिया उद्धव जी के लिए परमब्रह्म का लिखा लेख वेद समान था वे उसे संभाले संभाले ब्रज में आये थे गोपियो ने जब वो चिठ्ठी नही पढ़ी तो कृष्ण के विरह में व्याकुल राधा जी को वह पाती दिखाई , राधा रानी ने उसे पढ़े बिना गोपियों को वापस दे दी और गोपियों ने उसे पढ़े बिना उसके कई टुकड़े कर आपस में बाँट लिया | उद्धव जी बौखला गए , चिल्लाने लगे अरे मूर्खो इस पर जगदगुरु ने योग का ज्ञान लिखा है , क्या तुम कृष्ण विरह में नहीं हो जो उनका लिखा पढ़ा तक नहीं |

तब राधा जी ने उद्धव को समझाया
" उधौ तुम हुए बौरे, पाती लेके आये दौड़े...हम योग कहाँ राखें ? यहां रोम रोम श्याम है "
अर्थात हे उधौ कृष्ण तो यहां से गए ही नहीं ? कृष्ण होंगे दुनिया के लिए योगेश्वर यहां पर तो अब भी वो धूल में सने हर घाट वृक्ष पर बंसी बजा रहे हैं | बताओ कहाँ है विरह ? यह ज्ञान आज के युग के लिए एक मार्ग दर्शन है , जब कि हम कृष्ण को आडम्बरों में खोजते हैं |कहने लगी अरे उधो हम उस परम ब्रम्ह के योग को लेकर क्या करेंगी जिसमे श्री कृष्ण के अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई दे इसलिए हे उधो हमारे लिए तो ये विरह ही सबसे अच्छा है कम से कम श्री कृष्ण हमारे पास न सही लेकिन उनके मधुर मिलन की जो यादें हमारे पास शेष बची हुई है अब तुम उन्हें भी हमसे छीन लेना चाहते हो तुम्हारे उस योग में रखा ही क्या है इसलिए हमारे लिए तो ये वियोग ही अच्छा है इसलिए जब तक हमारे शरीर में प्राण है हम अपने प्रिय श्री कृष्ण की यादों के सहारे ही जी लेंगी तुम हमें ज्ञान और योग की शिक्षा मत दो अगर हमारे श्री कृष्ण को मथुरा जा कर सुख महसूस हो रहा है तो हमारे लिए भी यही सुख है तुम हमें अपना व्यर्थ का योग देकर हमसे हमारे श्री कृष्ण की उन यादों को भी छीन ले जाना चाहते हो हे उधो तुम कितना अनुचित कार्य कर रहे हो हम उस परम ब्रम्ह की भक्ति कर क्या सुख प्राप्त करेंगी हमें जो सुख अपने श्री कृष्ण की भूली विसरी यादों में प्राप्त होता है वह अनमोल है उसका तो कोई मोल है ही नही इसलिए हे उद्धव जो सुख जो आनंद हमें श्री कृष्ण की याद में उनके विरह रस में एक आंसू भी गिरने से मिलता है वो रस वो आनंद तुम्हारे उस ब्रम्ह की भक्ति में कहाँ हमारे लिए तो श्री कृष्ण ही ब्रम्ह है वही हमारे सर्वस्व है इसलिए तुम अपने ब्रम्ह ज्ञान का उपदेश अपने पास ही रखो गोपियों की मनोदशा देखकर उद्धव जी का सारा ज्ञान और योग उपदेश धरा रह गया और वे भी ब्रज गोपियों के ही रंग में रंग गए और वापस मथुरा आकर श्री कृष्ण से कहने लगे के कितना अच्छा न्याय कर के आये हो उन ब्रज गोपियों के साथ जिन्हें रोता विलखता छोड़कर चले आये क्या तुम्हारे पास और कुछ नही बचा था तो उन ब्रज गोपियों को तुम रोना धोना देकर आ गए क्या तुम्हारे खजाने में यही सब बचा था तो भगवान् श्री कृष्ण कहने लगे हे उद्धव वास्तव में में उन ब्रजगोपियो का ऋणी हूँ और वो ऋण में कभी चुका नही सकता इसलिए में तो उन्हें पीठ दिखाकर आया हूँ उनका सामना कर पाने का साहस तो मुझ में है ही नही इसलिए में तो उनका गुलाम हूँ अब भला में उन्हें उनके इस प्रेम के बदले क्या दे सकता हूँ मेरा सब कुछ तो उनके पास गिरवी रखा हुआ है लेकिन फिर भी मैंने उन्हें वही अनमोल रत्न दिया है जो दुर्लभ है उद्धव जी बोले ऐसा कोनसा दुर्लभ रत्न तुम उन गोपियों को दे के आये हो मैंने तो उनके पास रोने धोने के अतिरिक्त और कुछ नही देखा भगवान् कहने लगे उधो मेरा विरह ही मेरे खजाने का सबसे अनमोल रत्न है.इसलिए बड़े बड़े ऋषि मुनि और साधु संत भी योग और ध्यान में भगवान् के विरह में ध्यानमग्न रहते है क्यों की श्री कृष्ण के विरह में जो आनंद उन्हें प्राप्त होता है वह अन्य किसी वस्तु में नही.