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दुर्वासा ऋषि कौन थे

दुर्वाशा ऋषि अत्रि ऋषि ओर अनिसुया के पुत्र थे. इनके दो भाई ओर थे दत्तात्रेय ओर चन्द्रमा. दुर्वाशा ऋषि अपने गुस्से ओर नाराजगी के लिए भी कुख्यात थे. बहुत क्रोधी स्वाभाव के ऋषि थे. जल्दी ही छोटी छोति बातों पर नाराज़ होते थे. यह सतयुग त्रेता ओर द्वापर तीनो युगो मे रहे. इन्ही से आशीर्वाद लेकर कुंती ने देवताओं से पुत्र पैदा करने का मंत्र लिया. इनके दिए हुए मन्त्र से हि कुंती के चार पुत्र हुए जिनके नाम थे कर्ण, युधिष्ठिर, भीम ओर अर्जुन तथा कुंती के बताये हुए मन्त्र से माद्री ने भी दो पुत्र पैदा किये जिनके नाम हे नकुल ओर सहदेव. इन सब के लिए कुंती ने सूर्य धर्म पवन इंद्र ओर अश्विनी कुमार का आवाहन किया था.

अत्रि ऋषि ब्रह्मा जी के पुत्र थे उनके नेत्र से पैदा हुए थे. अनुसूया देवहिति ओर ऋषि कर्दम कि पुत्री थी. कर्दम ऋषि भी ब्रह्मा जी के पुत्र थे ओर ब्रह्मा जी कि छाया से उत्पन्न हुए थे. अनुसूया बड़ी ही सती ओर पतिव्रता धर्म को मानने वाली मानी जाती थी. इनका आश्रम चित्रकुट मे था वही पर राम जी ओर सीता जी इनके आश्रम मे कुछ समय अपने वनवास के दौरान रहे. सती अनुसूया ने सीता जी को पतिव्रता धर्म पढ़ाया. देवहुति मनु ओर शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत ओर बहिर्ष्मती की पुत्री थी. कर्दम ओर देवहुति से नौ कन्याये और एक पुत्र कपिल मुनी थे.

चन्द्रमा जो कि ऋषि दुर्वाशा के भाई थे के पुत्र बुद्ध से चंद्र वंश कि स्थापना हुयी. बुद्ध ओर इला से पुरुरुवा हुए. इला वैवस्वत मनु की पुत्री थी. वैवस्वत मनु या श्राद्ध देव के पुत्र इच्छवाकु से सूर्य वंश स्थापित हुआ.

त्रेता युग की कथा

दुर्वाशा जी एक बार राम से मिलने अयोध्या आये अयोध्या मे राम के भवन को द्वारपाल लक्ष्मण थे ओर रखवाली कर रहे थे. उनको राम से किसी के न मिलने देने के आदेश थे लेकिन ऋषि दुर्वाशा के कोप से भयभीत लक्ष्मण ने इस रामाज्ञा का पालन नहीं किया ओर राम से ऋषि को मिलने दिया जिससे रामाज्ञा का उल्लंघन देख राम ने इनको मृत्यु दंड दिया. इस तरह त्रेता योग का समापन हुआ. अतः दुर्वाशा बड़े हि कमाल के क्रोधी मुनि थे इनके गुस्से से बचने के लिए लक्षमन ने राजाज्ञा का उल्लंघन किया ओर फिर दंड के पात्र बने.

द्वापर युग की कथा

एक बार ज़ब पाण्डव बनवास मे थे ओर द्रोपदी के साथ थे तब दुर्वाशा जी उनके घर वन मे उनसे मिले ओर पांडवों से खाना खाने कि इच्छा जताई इनके साथ इनके शिष्य भी थे. उस समय घर मे बनाना असंभव था. द्रोपदी को बहुत चिंता हुयी कि कहीं ऋषि नाराज़ होकर श्राप न देदे.

कोइ रास्ता न देख द्रोपदी ने फिर भगवान श्री कृष्ण का स्मरण किया. कृष्ण आये ओर ऋषि दुर्वाशा को भोग में संतुष्ट करने ओर नाराज़ न होने देने कि एक नीति अपनायी. उस समय द्रोपदी के रसोई के बर्तन मे चिपटे हुए एक चावल के तटुकडे को कृष्ण ने खाकर दुर्वाशा कि भूख खत्म कर दी ओर उन्होंने खाने मे अनिच्छा दिखाई. फिर सभी ऋषि लोग वन से चले गए. तब पांडवों ने राहत कि सांस ली ओर कृष्ण का शुक्रिया किया.